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[यह दुनिया चुड़ैल के समान है, जो भोले मनुष्य को अपने जाल में फंसा कर, मक्ति-पथ से विचलित कर देती हैं परन्तु जब जादूगर की तरह कोई सच्चा ज्ञानी मिल जाता है तो मनुष्य के मन को परमात्मा की ओर लगा देता है।]१

फिर हजरत अली ने पहलवान से कहा, "ऐ जवान! जबकि युद्ध के समय तूने मेरे मुंह पर थूका तो उसी समय मेरे विचार बदल गये। उस वक्त युद्ध का उद्देश्य आधा खुदा के वास्ते और आधा तेरे जुल्म करने का बदला लेने के लिए हो गया, हालांकि खुदा के काम में दूसरे के उद्देश्य को सम्मिलित करना उतिच नहीं है। तू मेरे मालिक की

४. मौलाना रूमी और उनका उर्दू काव्य: ले० श्री जगदीश चन्द्र वाचस्पति।

मुर्गे ने जवाब दिया, "वह घोड़ा दूसरी जगह मर गया। मालिक घोड़ा बेचकर हानि उठाने से बच गया और अपना नुकसान दूसरों पर डाल दिया, लेकिन कल इसका ऊंट मर जायेगा। तो कुत्तों के पौबारह हैं।"

आशा न रक्खो। जो मनुष्य शैतान के धोखे में फंसकर लाहौल खाता है, वह खच्चर की तरह मार्ग में सिर के बल गिरता है। किसी के धोखे में नहीं आना चाहिए। कुपात्रों की सेवा ऐसी होती है, जैसी इस सेवक ने की। ऐसे अनधिकारी लोगों के धोखे में आने से बिना नौकर के रहना ही अच्छा है।]१

स्त्री की प्रार्थना तथा अपने परिश्रम और प्रयत्न से वह अरब हर विपत्ति से बचता हुआ राजी-खुशी राजधानी तक पानी की मशक को ले पहुंचा। वहां जाकर देखा, बड़ा सुन्दर महल बना हुआ है और सामने याचकों का जमघट लागा हुआ है। हर तरफ के दरवाजों से लोग अपनी प्रार्थना लेकर जाते हैं और सफल मनोरथ लौटते हैं।

[इसी तरह संसार के मनुष्यों को तृष्णा को रोग हो गया है कि वे दुनिया की प्रत्येक वस्तु को, भले ही वह कितनी ही गन्दी हो, पर प्रत्यक्ष रुप में सुन्दर हो, अपने पेट में उतारने की इच्छा रखते हैं। लेकिन दूसरी तरफ यह हाल है कि बिन मृत्यु के मार्ग पर चले इन्हें चारा नहीं और वह अजीब रास्ता है, जो इन्हें दिखाई नहीं देती। प्राणियों के दल-के-दल इसी सूराब से निकल जाते हैं और वह सूराख नजर नहीं आता। जीवों का यह समूह इसी द्वार के छिद्र में घुस जाता है और छिद्र तो क्या, दरवाजा तक भी दिखाई नहीं देता और इस कथा में बहरे का उदाहरण यह है कि अन्य प्राणियों की मृत्यु का समाचार तो वह सुनता है, परन्तु अपनी मौत से बेखबर है।

एक आदमी सोना तोलने के लिए सुनार के पास तराजू मांगने आया। सुनार ने कहा, "मियां, अपना रास्ता लो। मेरे पास छलनी नहीं है।"

सूफी ने जी में कहा, "जो कुछ मेरे साथ होनी थी, वह तो हो चुकी; परन्तु मेरे साथियो! जरा अपनी खबर लो। तुमने मुझको पराया समझा, हालांकि मैं इस दुष्ट माली से ज्यादा पराया न था। जो कुछ मैंने खाया है, वही तुम्हें भी खाना है और सच बात तो यह है कि धूर्तों को ऐसा दण्ड मिलना चाहिए।"

[ऐ मनुष्य, जब तू पैगम्बर नहीं तो निर्दिष्ट मार्ग से चल, जिससे कि कुएं-खाई से बचकर आसानी से अपने लक्ष्य पर पहुंच जाये। जब तू बादशाह नहीं तो प्रजा बनकर रह और जब तू मल्लाह नहीं तो नाव को न चला। तांबे की तरह रसायन का सहारा ले। ऐ मनुष्य! तू महापुरुषों की सेवा कर।] १

[संपादित करें] नाजुक प्रतिष्ठा "वो सिर्फ़ एक उम्र का नही था, बल्कि हर समय का था."

एक युवक ने हजरत मूसा से चौपायों की भाषा सीखने की इच्छा प्रकट की, ताकि जंगली पशुओं की वाणी से ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करे, क्योंकि मनुष्य की सारी वाक्शक्ति तो छल-कपट में लगी रहती है। सम्भव है, पशु अपने पेट भरने का कोई ओंर उपाय करते हों।

लुकमान आये और सामने बैठ गये। मालिक ने छुरी उठायी और अपने हाथ से खरबूजा काटकर एक फांक लुकमान को दी। उन्होंने ऐसे शौक से खायी कि मालिक ने दूसरी फांक दी, यहां तक कि सत्रहवीं फांक तक वे बड़े शौक से खाते रहे। जब केवल एक टुकड़ा बाकी रह गया तो मालिक ने कहा, "इसको मैं more info खाऊंगा, जिससे मुझे भी यह मालूम हो कि खरबूजा कितना मीठा है।"

जब सुलेमान के उत्तम शासन की धूम मची, तो सब पक्षी उनके सामने विनीत भाव से उपस्थित हुए। जब उन्होंने यह देखा कि सुलेमान उनके दिल का भेद जाननेवाला और उनकी बोली समझने में समर्थ है तो पक्षियों का प्रत्येक समूह बड़े अदब के साथ दरबार में उपस्थित हुआ।

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